भावना योग का महत्त्व

सोहं इत्यात्त संस्कारात् तस्मिन् भावनया पुन:।
तत्रैव दृढ़ संस्कारात् लभते हि आत्मनि स्थितिम्।।

जो ध्यान है वह चित्त की एकाग्रता का नाम है और वहां तो यह कहा गया कि यदि तुम ध्यान की गहराई में डूबना चाहते हो तो ‘तुम कोई भी चेष्टा मत करो, कुछ बोलो मत, कुछ सोचो मत, आत्मा को आत्मा में स्थिर रखो; यही परम ध्यान है।’ शून्य भाव में पहुंच जाना, विचार शून्य, विकल्प शून्य, क्रिया शून्य, वह परम ध्यान है।

भावना योग की बात है, वह ध्यान नहीं है। वह एक अलग साधना, एक अभ्यास, एक ऐसा योग जिसके बल पर हम अपनी आत्मा का निर्मलीकरण कर सके, अपनी चेतना की विशुद्धि बढ़ा सकें।

भावना योग: आत्मा के निर्मलीकरण का साधन

भावना योग की बात है, वह ध्यान नहीं है। वह एक अलग साधना, एक अभ्यास, एक ऐसा योग जिसके बल पर हम अपनी आत्मा का निर्मलीकरण कर सके, अपनी चेतना की विशुद्धि बढ़ा सकें।

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    श्रद्धापूर्वक एवं नियमित प्रयोग से पहले सप्ताह से इसके लाभ प्राप्त होने लगते हैं।

    तो यदि भावना योग को प्रति दिन 30 minutes दोहराएंगे तो यह आपके बचे साढ़े 23 घंटे में आपको अलग ऊर्जा का अनुभव होगा जो आपको शांत व सकारात्मक बना आपके लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

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