भावना योग का महत्व
भावना योग का चमत्कार इस सत्य में निहित है कि यह साधना मनुष्य के बाहरी जीवन से अधिक उसके भीतरी संसार को रूपांतरित करती है। भावना योग वह सूक्ष्म योग है, जिसमें भावनाओं को शुद्ध करने, चेतना को जाग्रत करने और आत्मा के निर्मलीकरण पर केंद्रित साधना की जाती है। सामान्यतः हम अपने जीवन में कर्म और विचारों पर अधिक ध्यान देते हैं, परंतु भावना योग सिखाता है कि विचार और कर्म—दोनों का मूल स्रोत हमारे भाव होते हैं। जब भाव शुद्ध होते हैं, तो स्वतः ही विचार और कर्म भी शुद्ध होने लगते हैं।
भावना योग में साधक अपने भीतर उठने वाली भावनाओं को दबाने या नकारने के बजाय, उन्हें सजगता और समता के साथ देखना सीखता है। क्रोध, भय, ईर्ष्या, मोह और आसक्ति जैसे भाव जब जागरूकता के प्रकाश में आते हैं, तो उनकी तीव्रता धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। इनके स्थान पर करुणा, प्रेम, समता, क्षमा और कृतज्ञता जैसे सकारात्मक भाव विकसित होते हैं। यही भावना योग का चमत्कार है—जहाँ बिना संघर्ष, बिना हिंसा और बिना कठोर तप के भीतर गहन परिवर्तन घटित होता है।
भावना योग क्या है? यह आत्मनिरीक्षण और भावनात्मक शुद्धि की साधना है, जिसमें श्वास, चित्त और भावों को एक सूत्र में पिरोया जाता है। इसमें साधक अपने मन की प्रतिक्रियाओं को समझता है और परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को बदलने की क्षमता विकसित करता है। इससे मानसिक अशांति, तनाव और भय में कमी आती है तथा आंतरिक शांति और संतुलन का अनुभव होता है।
भावना योग केवल ध्यान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियाँ जैसी भी हों, भीतर समता और स्थिरता कैसे बनाए रखी जाए। नियमित भावना योग अभ्यास से व्यक्ति के संस्कार परिवर्तित होने लगते हैं, कर्मबंधन शिथिल होते हैं और आत्मिक बल बढ़ता है।
भावना योग का प्रभाव केवल साधक तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके विचार, व्यवहार और ऊर्जा के माध्यम से परिवार, समाज और परिवेश तक फैलता है। जब भाव शुद्ध होते हैं, तब जीवन सहज, सरल और आनंदमय बनता है। यही भावना योग का वास्तविक चमत्कार है—आत्मा से आत्मा तक प्रकाश का प्रसार और भीतर से उठती हुई शांति की अनुभूति।
आचार्य कुंदकुंद की उस उक्ति को हमें ध्यान रखना चाहिए वो कहते हैं जो मुनि नित्य अपनी इस आत्मा की भावना भाता है,बार-बार उस सब दुखों से शीघ्र मुक्त हो जाता है। आचार्य कुंदकुंद की इसी बात को छठवीं शताब्दी में हमारे एक महान आचार्य पूज्यपाद ने इसी बात को और व्यवहारिक रूप से व्याख्याइत करते हुए कहा ‘तुम बस पर हर पल सोहम मेरे इस दृश्य जगत से परे भीतर में स्थित अमूर्त शुद्ध ज्ञाता दृष्टा चेतन रूप जो आत्म तत्व है वह मैं हूं। सोहम वह तत्व रूप मैं हूँ, इस प्रकार के संस्कार को जिसने प्राप्त किया; बार-बार उसकी भावना वाले, उसी में उसके दृढ़ संस्कार बन जाने से अपनी आत्मा परमात्मा की स्थिति को प्राप्त कर लेता है। यह बीज है भावना योग का। क्यों ना हम इसी बात को ठीक तरीके से परिवर्तित करें। पश्चिम की उन बातों को पढ़ा तो देखा कि वो जो बोलते हैं वह बातें हमारे शास्त्रों में, भगवान महावीर ने हम सब के जीवन को पवित्र बनाने के लिए बताई है। इससे फैलाना चाहिए, जन-जन तक जानी चाहिए, यह जैन धर्म का प्राण है, जैन साधना का प्राण है।
हमारे भगवान महावीर ने, हमारे तीर्थंकरों ने हम मुनियों को अपने जीवन को विशुद्ध के लिए कुछ साधना बताइ। उसमें सामायिक है, प्रतिक्रमण है, स्तुति है, बंदना है, स्वाध्याय है और प्रत्याख्यान है। जब पढ़ा, देखा कि इसमें पूरा मनोविज्ञान छिपा है, सामाजिक में आत्म तल्लीनता है, प्रतिक्रमण में दोषों का शोधन है और प्रत्याख्यान में भावी दोषों के प्रति जागरूकता है भविष्य के प्रति सतर्कता का संकल्प है और स्तुति वंदना में एक प्रार्थना है। जब हम लोग प्रतिक्रमण पाठ करते हैं तो हम लोगों के प्रतिक्रमण वह सब चीजें बातें हैं कि क्या मुझे ग्रहण करना क्या मुझे छोड़ना है। वर्तमान में पश्चिम में एक पद्धति विकसित हुई ऑटो सजेशन की। ऑटो सजेशन का मतलब है आप जो चाहते हैं उसकी फीडिंग आप दीजिए, सेल्फ मोटिवेशन होगा और वह आप पाएंगे आपको जो चाहिए। उसकी भावना भाईये, और जिससे बचना चाहते उसको छोड़ते जाइए तो यह सब बातें दिखी और लगा कि इन बातों को यदि हम ठीक तरीके से प्रस्तुत करें जीवन में आमूलचूल परिवर्तन होगा।
इसे ही स्तुति और बंदना को प्रार्थना में गर्भित किया और कायोत्सर्ग को सामायिक में गर्भित करके कार्यक्रम डिजाइन किया गया। नया कुछ नहीं, भगवान की बातों की नयी व्याख्या है। चार चीज़ें है प्रार्थना inner nourishment , प्रतिक्रमण inner cleaning , प्रत्याख्यान inner resolution और सामायिक inner reflection जो हमारे भीतर के अंतःकरण की शुद्धि की प्रक्रिया है। इसमें सबसे पहले भगवान से कुछ अच्छी प्रार्थना करते हैं अपने आपको सकारात्मक शांत और सक्षम बनाने की; इसके बाद हम अपने अतीत के दोषों को झांक कर के उसे साफ करने की कोशिश करते हैं, अपनी निंदा- गृहा करते हुए मन को साफ और स्वच्छ बनाना, फिर भावी जीवन को, आज के दिन को उत्सव की तरह मैं कैसे जियूं इस संकल्प को दोहराते है यह प्रत्याख्यान कहलाता है और इसके बाद आत्म से लीनता सामायिक, ‘शुद्धोहम बुद्धहम निरंजनओहम’ मैं शांत हूं मैं स्वस्थ हूं मैं निरंजन हूँ। इस पद्धति को अपनाएं इसे आजकल पश्चिम में न्यूरोसाइको इम्यूनोलॉजी नाम दिया है।
न्यूरोसाइकोइम्यूनोलॉजी क्या है जब हम सोचते हैं तो हमारी भावनाओं का हम पर बहुत असर पड़ता है हमारी भावनाओं से हमारी ग्रंथियों में परिवर्तन आता है हमारी अनेक ग्रंथियां है जितनी अंत स्रावी ग्रंथि है हमारी भावनाओं से प्रभावित होती है। कोई व्यक्ति एकदम उदास बैठा हो रो रहा हो उसका चेहरा दिखे उसे कोई मोटिवेट कर दे उसके मन के बोझ को उतार दे देखते-देखते चेहरा खिल जाता है। उदास क्यों हुआ उसके अंदर की गलतियों में वैसा स्त्राव हुआ, चेहरा खिला क्यों क्योंकि उसकी ग्रंथियों का स्त्राव बदल गया। यह रोज का अनुभव है, तो जब हम सोचते हैं हमारी भावना से हमारे न्यूरो सिस्टम में भी परिवर्तन होता है क्योंकि हमारी अंतः स्रावी ग्रंथियों में बदलाव आता है और उससे हमारी इम्युनिटी में असर पड़ता है। तो भावना योग एक ऐसी प्रक्रिया है जो तन को स्वस्थ, मन को मस्त और आत्मा को पवित्र बनाती है।
भावना योग के विषय में एक अनुभव, एक पुस्तक में था कि एक के घुटने का ऑपरेशन होना था डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया लेकिन जब उसको इस तरह के ट्रीटमेंट की बात की गई उसने अपने ऑपरेट न करवाकर अपनी भावनाओं के बल पर घुटने को ठीक कर लिया। एक का हार्ट का ऑपरेशन होना था वह हार्ट के ब्लॉकेज को भावनाओं के बल पर खोल दिया। उसके लिए चाहिए कि हम अपने शरीर के जो एनाटॉमी है उसका ध्यान रखें और जहाँ जहाँ ब्लॉकेज है अपनी भावनाओं से वहां अच्छी तरंगे भेजें उसकी क्लीनिंग करें। उस समय मुनिश्री प्रमाणसागर जी स्वयं को एक प्रॉब्लम हुई उनके दाहिने हाथ में एक नस सूखने लगी। यह 2009 की बात है, 2008 से ये प्रॉब्लम हुई थी नस सूखने के कारण हाथ पौन इंच पतला हो गया और उस समय पिच्छी भी भारी लगती थी जबकि पिच्छी का वजन 200 ग्राम से ज्यादा नहीं होता पिच्छी भी वजनदार लगती थी। डॉक्टरों ने देखा MRI हुआ veins सूख गई, इसका कोई इलाज नहीं और आज भी मेडिकल के हिसाब से इसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन मुनिश्री ने अपनी भावनाओं के बल पर मेंटल रेडिएशन देकर उसको ठीक कर दिया। आज दोनों हाथ ठीक है।
तो यदि भावना योग को दोहराएंगे यह आपके लिए बहुत उपयोगी है। प्रमाणिक एप पर उपलब्ध है। अपने शरीर को आप दिन भर अच्छा काम लेना चाहते हैं तो आधा घंटा तो आपको देना पड़ेगा। आधा घंटा अपने शरीर को देंगे तो बाकी बचे साढ़े 23 घंटे में आपको अलग ऊर्जा होगी, आप अपने प्रति ज्यादा सकारात्मक हो सकेंगे, शांत हो सकेंगे। पर्युषण से भावना योग जब शुरू किया तो बहुत लोगों ने अपना एक्सपीरियंस मुनिश्री के पास आकर शेयर किया, पत्रों के माध्यम से भी बात की कि उनके जीवन में व्यापक बदलाव है। यह बदलाव घटित होगा तभी, जब आप ऐसा कर सकेंगे। सुबह-सुबह ना हो तो शाम को, सुबह का समय सबसे उपयुक्त होता है यह बहुत अच्छी चीज है। हमें इसका व्यापक प्रचार-प्रसार करना चाहिए। यह मूलतः जैन साधना है, भगवान महावीर की साधना है। मुनिश्री ने इसे बहुत रिसर्च के बाद तैयार किया, गाइडेड मेडिटेशन भी आजकल चलता है तो उसको ऑन करिए, सुनते जाइये और जो निर्देश आपको मिले वैसा महसूस करते जाइये। आप देखेंगे कि आपका मन कितना शांत होता है, कितना संयत होता है। चीजों की उपलब्धि के लिए हमारे पास कुछ नहीं है, मन की शांति के लिए आप चाहोगे इससे बढ़कर और कुछ नहीं है।
Frequently asked questions
भावना योग से जुढे सभी सवालों का जबाव आप को यहाँ मिलेंगे |
भावना योग की बात है, वह ध्यान नहीं है। वह एक अलग साधना, एक अभ्यास, एक ऐसा योग जिसके बल पर हम अपनी आत्मा का निर्मलीकरण कर सके, अपनी चेतना की विशुद्धि बढ़ा सकें। वर्तमान में एक सिद्धांत विकसित हुआ ‘ला ऑफ अट्रैक्शन’ हमारे विचार साकार होते हैं, हम जैसा सोचते हैं जैसा बोलते हैं जैसी क्रिया करते हैं संस्कार हमारे सबकॉन्शियस में पड़ जाते हैं ।
भावना योग कोई भी कर सकता है यह किसी धर्म से नहीं जुड़ा अपितु कोई भी इसे अपने जीवन मैं उतर कर अपना जीवन सुखी और समृद्ध बना सकता है
भावना योग करने मैं कोई फिक्स समय नहीं है आप जितने समय करना चाहते हैं कर सकते हैं, अगर आप व्यस्त हैं तो अपने डेली जीवन मैं ५ मिनट्स मैं भी इसे कर सकते हैं |
